कत्यूरी राजवंश का इतिहास: उत्तराखंड का पहला साम्राज्य, जागेश्वर-बैजनाथ के मंदिर और रहस्यमयी पतन
सातवीं से ग्यारहवीं सदी तक उत्तराखंड पर राज करने वाले कत्यूरी राजवंश की पूरी कहानी: ताम्रपत्रों के प्रमाण, प्रशासन और सेना, जागेश्वर-बैजनाथ-कटारमल के मंदिर, जियारानी की गाथा और राजा वीरमदेव के श्राप की लोककथा।
देवभूमि उत्तराखंड का इतिहास अक्सर चंद वंश, पंवार वंश और बाद के गोरखा व ब्रिटिश शासन के संदर्भ में याद किया जाता है। लेकिन ताम्रपत्रों और शिलालेखों जैसे ठोस प्रमाण बताते हैं कि इस हिमालयी भूमि का पहला संगठित, केंद्रीकृत और विस्तृत साम्राज्य कत्यूरी राजवंश (Katyuri Dynasty) था। इस क्षेत्र को तब कूर्मांचल या केदारखंड कहा जाता था।
सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच, और अपनी शाखाओं के रूप में बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी तक, इस साम्राज्य ने कुमाऊं और गढ़वाल के बिखरे जनपदों को एक सूत्र में पिरोया। चरम पर इसका प्रभाव पश्चिम में सतलुज से पूर्व में नेपाल की गंडकी नदी तक, उत्तर में तिब्बत की सीमा से दक्षिण में रुहेलखंड के मैदानों तक माना जाता है।
संक्षेप में: कत्यूरी राजवंश
- कालखंड: लगभग 7वीं से 11वीं शताब्दी (शाखाएँ 12वीं-13वीं सदी तक)
- प्रारंभिक राजधानी: जोशीमठ (कार्तिकेयपुर); बाद में कत्यूर घाटी (बैजनाथ क्षेत्र, 'सुभिक्षपुर')
- लिपि और भाषा: कुटिला लिपि, मुख्यतः संस्कृत
- प्रमुख शासक: वसंतदेव, निम्बर देव, इष्टगण देव, ललितशूर देव, भूदेव, सुभिक्षराज देव
- प्रमुख स्मारक: जागेश्वर धाम, बैजनाथ मंदिर, कटारमल सूर्य मंदिर, योगबद्री मंदिर
- अंतिम शासक (लोकगाथाओं में): राजा वीरमदेव (ब्रह्मदेव)
सुझाव: जागेश्वर धाम के मंदिर समूह की फोटो
ऐतिहासिक स्रोत: ताम्रपत्र, शिलालेख और कुटिला लिपि
प्राचीन हिमालयी इतिहास को जोड़ने में सबसे बड़ी चुनौती लिखित स्रोतों की कमी रही है। कत्यूरी इतिहास की वैज्ञानिक जानकारी मुख्य रूप से उनके ताम्रपत्रों और पाषाण शिलालेखों से मिलती है। इनकी भाषा मुख्यतः संस्कृत और लिपि 'कुटिला' है, जो प्राचीन ब्राह्मी का ही विकसित, घुमावदार रूप है।
पांडुकेश्वर ताम्रपत्र
चमोली जिले में बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित पांडुकेश्वर से चार महत्वपूर्ण ताम्रपत्र मिले हैं, जिनमें से एक का समय लगभग 853-854 ईस्वी (ललितशूर देव के शासन का 21वाँ-22वाँ वर्ष) माना गया है। इनमें ललितशूर देव, पद्मटदेव और सुभिक्षराज देव के शासन, मंदिरों और ब्राह्मणों को दिए गए भूमि अनुदान, कर व्यवस्था और अधिकारियों की लंबी सूची का वर्णन है। यह बताता है कि कत्यूरी राज्य केवल बाहुबल पर नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक संहिता पर चलता था।
सुझाव: ताम्रपत्र / शिलालेख या पांडुकेश्वर की फोटो
बागेश्वर शिलालेख
गोमती और सरयू के संगम पर बागनाथ मंदिर परिसर से मिला यह शिलालेख राजा त्रिभुवनराज और राजा भूदेव से जुड़ा है। इसमें भूदेव को 'ब्राह्मण परायण' और 'परम श्रमण रिपु' (बौद्ध भिक्षुओं का कट्टर शत्रु) कहा गया है। यह उस दौर की ओर संकेत करता है जब आदि शंकराचार्य के हिमालय आगमन के बाद इस क्षेत्र में बौद्ध प्रभाव घट रहा था और शैव मत का पुनरुत्थान हो रहा था।
तालेश्वर ताम्रपत्र
अल्मोड़ा से मिले ये ताम्रपत्र कत्यूरियों से पहले के 'पौरव वर्मन' वंश (राजा विष्णुवर्मन, द्युतिवर्मन) से जुड़े हैं। ये साबित करते हैं कि कत्यूरियों के उदय से पहले कुमाऊं में ब्रह्मपुर नाम का एक संगठित राज्य मौजूद था, जिसकी प्रशासनिक परंपराएँ (राजमात्य, प्रमातार जैसे पद) कत्यूरियों ने आगे अपनाईं।
कत्यूरी राजवंश की उत्पत्ति: इतिहासकारों के चार मत
कत्यूरियों की उत्पत्ति पर इतिहासकारों में गहरा मतभेद है। प्रमुख मत ये हैं:
- अयोध्या के शालिवाहन वंशी (बद्री दत्त पांडे): 'कुमाऊं का इतिहास' (1937) में पांडे जी लोकगाथाओं के आधार पर इन्हें अयोध्या के शालिवाहन वंश का वंशज और सूर्यवंशी मानते हैं।
- कुमाऊं के मूल निवासी (ई.टी. एटकिंसन): 'हिमालयन गजेटियर' में एटकिंसन इन्हें गोमती तट के प्राचीन 'करवीरपुर' से जोड़ते हैं। यह मत इसलिए तर्कसंगत माना जाता है कि बाहरी राजवंश के लिए दुर्गम पहाड़ों में रातों-रात साम्राज्य खड़ा करना कठिन था।
- खश जाति (राहुल सांकृत्यायन): सांकृत्यायन के अनुसार ये मूलतः खश थे, जिन पर हिमालय में बसे शकों का गहरा प्रभाव था।
- कुणिंद साम्राज्य की शाखा (पावेल-प्राइस आदि): कुणिंदों के पतन के बाद उन्हीं की एक शाखा ने राजनीतिक शून्य का लाभ उठाकर शक्ति जुटाई, ऐसा भी माना जाता है।
कत्यूरी वंश का कालक्रम: तीन राज-परिवार
कत्यूरी कोई एक अखंड वंशावली नहीं, बल्कि लगभग तीन सदियों में शासन करने वाले तीन से अधिक राज-परिवारों का राजनीतिक संघ था। पहली राजधानी जोशीमठ (कार्तिकेयपुर) थी; बाद में राजधानी कुमाऊं की कत्यूर घाटी (गोमती तट, वर्तमान बैजनाथ) में गई, जिसे 'सुभिक्षपुर' भी कहा गया।
प्रथम परिवार: वसंतदेव का काल (लगभग 700-849 ई.)
लोकपरंपरा में संस्थापक वासुदेव माने जाते हैं, जिन्हें जोशीमठ के वासुदेव मंदिर का श्रेय दिया जाता है। बागेश्वर शिलालेख में पहले प्रामाणिक शासक का नाम वसंतदेव मिलता है, और कई इतिहासकार दोनों को एक ही मानते हैं। उन्होंने 'परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर' जैसी उपाधि धारण की। खर्परदेव, कल्याणराज और त्रिभुवनराज इस परिवार के अन्य शासक थे। त्रिभुवनराज ने व्याघ्रेश्वर (बागनाथ) मंदिर को भूमि दान दी।
द्वितीय परिवार: निम्बर वंश और चरमोत्कर्ष (लगभग 850-955 ई.)
इसके संस्थापक निम्बर देव कट्टर शैव थे। उनके पुत्र इष्टगण देव ने पूरे कुमाऊं-गढ़वाल को एक राजनीतिक और सांस्कृतिक सूत्र में बाँधा और जागेश्वर धाम में नवदुर्गा, लकुलीश और नटराज के मंदिर बनवाए। उनके पुत्र ललितशूर देव (लगभग 832-855 ई.) के काल में साम्राज्य अपने सबसे बड़े विस्तार पर पहुँचा; पांडुकेश्वर के ताम्रपत्रों में उन्हें 'वराह अवतार' की संज्ञा दी गई है। इसके बाद भूदेव गद्दी पर बैठे, जिन्होंने बैजनाथ मंदिर के निर्माण में भूमिका निभाई और बौद्ध प्रभाव को समाप्त करने के लिए कड़े कदम उठाए।
सुझाव: बैजनाथ मंदिर / कत्यूर घाटी की फोटो
तृतीय परिवार: सलोणादित्य वंश और बिखराव की शुरुआत (लगभग 955-1065 ई.)
इस परिवार की स्थापना इच्छटदेव ने की। देष्टदेव, पद्मटदेव और सुभिक्षराज देव इसके प्रमुख शासक रहे। सुभिक्षराज देव ने राजधानी को गोमती घाटी में स्थापित कर नए नगर का नाम अपने नाम पर 'सुभिक्षपुर' रखा। उनके बाद केंद्रीय ढाँचा चरमराने लगा, और पाल वंश जैसे छोटे शासक अस्कोट और डोटी जैसे क्षेत्रों में सिमटते गए।
कत्यूरी प्रशासन: विकेंद्रीकरण और संस्थागत मजबूती
दुर्गम हिमालय में सदियों तक शासन केवल सैन्य बल से संभव नहीं था। कत्यूरियों ने गुप्त और मौर्य परंपरा की तर्ज पर विकेंद्रीकृत प्रशासन बनाया। सबसे ऊपर प्रांत थे, जिनके प्रमुख को 'उपरिक' (आज के राज्यपाल जैसा) कहा जाता था। उसके नीचे 'विषय' (जिले के समान, प्रमुख 'विषयपति'), फिर 'क्षेत्र' या 'कर्मान्त' (तहसील जैसा, प्रमुख 'क्षेत्रपाल'), और सबसे छोटी इकाई गाँव 'पल्लिका' थी, जिसका प्रधान 'महत्तम' कहलाता था।
साम्राज्य पाँच प्रमुख विषयों में बँटा था:
| विषय (प्रांत) | भौगोलिक क्षेत्र और महत्व |
|---|---|
| कार्तिकेयपुर | जोशीमठ से कत्यूर घाटी (अल्मोड़ा/बागेश्वर) तक का मध्य क्षेत्र; साम्राज्य का हृदय और राजधानी क्षेत्र। |
| टंकणपुर | ऋषिकेश के ऊपरी भाग में अलकनंदा घाटी; तीर्थयात्रा और व्यापार मार्गों का मुख्य प्रवेश द्वार। |
| अन्तरांग | भागीरथी और अलकनंदा के बीच का भूभाग; कृषि और वन संपदा से समृद्ध। |
| देशाल | भागीरथी और यमुना के बीच का पश्चिमी क्षेत्र; पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा। |
| मयूरपुरहाट | हरिद्वार, भाभर और शिवालिक का मैदानी क्षेत्र; रुहेलखंड से लगती आर्थिक रूप से अहम सीमा। |
प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी
- महाकर्तकृत्य: राज्य के सभी कार्यों का मुख्य अन्वेषक, मुख्य सचिव के समकक्ष।
- राजमात्य: राजा का मुख्य सलाहकार या मुख्यमंत्री।
- महादण्डनायक: न्याय और दंड व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी।
- प्रमातार: भूमि माप और राजस्व रिकॉर्ड का प्रभारी; मापन में 'द्रोणवाप' और 'नाली' जैसी इकाइयाँ चलती थीं।
- शौल्किक: आयात-निर्यात पर चुंगी और कर वसूलने वाला अधिकारी।
- सौधभंगाधिकृत: भवनों, किलों और मंदिरों के निर्माण का मुख्य वास्तुकार।
- नरपति, घटपाल और प्रान्तपाल: नदी घाटों, पुलों, दर्रों और सीमाओं के रक्षक।
सैन्य संगठन और राज्य सुरक्षा तंत्र
उत्तर में तिब्बत, पूर्व में नेपाल के खश राजाओं और दक्षिण में मैदानी आक्रमणकारियों से रक्षा के लिए कत्यूरियों ने चतुरंगिणी सेना बनाई थी: पदातिक (पैदल सेना), अश्वारोही (घुड़सवार), गजारोही (हाथी) और उष्ट्रारोही (ऊँट)। पहाड़ों में हाथी-ऊँट अटपटे लगते हैं, लेकिन मयूरपुरहाट (हरिद्वार) और तराई-भाभर पर नियंत्रण को देखें तो साफ होता है कि इनका उपयोग मैदानी सीमाओं की रक्षा, विद्रोह दबाने और रसद-माल की ढुलाई के लिए होता था।
तीर्थयात्रियों और तिब्बत-मैदान के व्यापारिक कारवाँ की सुरक्षा के लिए बहुस्तरीय पुलिस और गुप्तचर तंत्र भी था: 'दांडिक' (लाठीधारी पुलिस), 'खड्गिक' (गंभीर सुरक्षा चुनौतियों के लिए तलवारबाज सैनिक), 'दोषापराधिक' (अपराध जाँच प्रमुख, आज की सीआईडी जैसा), 'चौरोद्धरणिक' (चोरों-डकैतों के लिए विशेष बल) और 'दुःसाध्यसाधनिक' (गुप्तचर विभाग प्रमुख)।
वास्तुकला का स्वर्ण युग: कत्यूरी काल के प्रमुख मंदिर
कत्यूरी काल को उत्तराखंड की वास्तुकला का स्वर्ण युग माना जाता है। इन मंदिरों में मुख्यतः उत्तर भारतीय 'नागर शैली' दिखती है, जिसकी पहचान वक्राकार शिखर और चौकोर गर्भगृह है। तकनीकी विशेषता 'पंचरथ' योजना है, जिसमें मंदिर का आधार पाँच भागों में बँटा होता है। भारी पत्थरों को बिना गारे के 'सूखी चिनाई' से जोड़ा गया, और उन्हें थामने के लिए लोहे के क्लैंप लगाए गए। भूकंप-संवेदनशील हिमालय में हज़ार वर्षों से अधिक समय से ये मंदिर इसी तकनीक के कारण खड़े हैं। कत्यूरी राजमुहर पर विश्राम करते हुए वृषभ (बैल) का चिह्न मिलता है, जो उनकी शैव निष्ठा दर्शाता है।
1. जागेश्वर धाम
अल्मोड़ा के पास जटागंगा के किनारे देवदार के घने जंगल में 124 छोटे-बड़े पाषाण मंदिरों का समूह है। इसका निर्माण मुख्यतः निम्बर और इष्टगण देव ने 8वीं से 10वीं सदी के बीच करवाया। लकुलीश, नटराज, नवदुर्गा और महिषासुरमर्दिनी के मंदिर कत्यूरी मूर्तिकला के बेहतरीन उदाहरण हैं।
2. बैजनाथ मंदिर समूह
बागेश्वर जिले में गोमती तट पर स्थित यह समूह राजा भूदेव द्वारा बनवाया गया माना जाता है और शिव-पार्वती को समर्पित है। यह कत्यूरियों की राजधानी सुभिक्षपुर का केंद्र भी था।
3. कटारमल सूर्य मंदिर
अल्मोड़ा के पास स्थित यह मंदिर 9वीं सदी में राजा कटारमल्ल ने बनवाया, इसे 'बड़ादित्य' भी कहते हैं। मुख्य मंदिर के चारों ओर 44 छोटे मंदिर हैं। मान्यता है कि इसकी बनावट सूर्य की स्थिति के अनुरूप है और पहली किरण सीधे गर्भगृह की मूर्ति तक पहुँचती है।
सुझाव: कटारमल सूर्य मंदिर की फोटो
4. पांडुकेश्वर का योगबद्री मंदिर
यह मंदिर एक दिलचस्प ऐतिहासिक विसंगति है। सुदूर उत्तर के हिमालय में स्थित होने के बावजूद इसका निर्माण दक्षिण भारतीय 'द्रविड़ शैली' में हुआ, जो आदि शंकराचार्य के आगमन के बाद दक्षिण के शिल्पकारों और पुजारियों के प्रभाव का संकेत देता है।
सुझाव: योगबद्री मंदिर, पांडुकेश्वर की फोटो
5. बागनाथ मंदिर
वर्तमान बागनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार 1450 ई. में चंद राजा लक्ष्मीचंद ने कराया, पर इसका मूल निर्माण कत्यूरी काल में हुआ और यहीं से भूदेव का प्रसिद्ध शिलालेख मिला। इस स्थल का संबंध मार्कंडेय ऋषि और भगवान शिव के व्याघ्र (बाघ) रूप से भी जोड़ा जाता है।
लोकगाथाओं में कत्यूरी विरासत: जियारानी और राजुला-मालूशाही
कत्यूरी इतिहास शिलालेखों के साथ जनमानस की स्मृति और 'जागर' गाथाओं में भी जीवित है, जो उस दौर के सामाजिक-राजनीतिक जीवन का सजीव चित्र देती हैं।
राजमाता जियारानी: कुमाऊं की लक्ष्मीबाई
पहाड़ में पूजनीय राजमाता जियारानी का असली नाम मौला देवी बताया जाता है। वे हरिद्वार के पुंडीर राजा अमरदेव की पुत्री और कत्यूरी राजा प्रीतमदेव की दूसरी पत्नी थीं। लोकगाथाओं और जनश्रुतियों के अनुसार 14वीं सदी के अंत (लगभग 1398 ई.) में जब तैमूर लंग ने हरिद्वार और कुमाऊं के भाभर क्षेत्र पर आक्रमण किया, तब जियारानी ने कत्यूरी सेना का नेतृत्व किया। हल्द्वानी के पास रानीबाग (चित्रशिला) में हुए युद्ध में उनके पराक्रम के आगे आक्रमणकारी सेना को पीछे हटना पड़ा।
एक अन्य प्रचलित जनश्रुति के अनुसार गौला नदी में स्नान के समय शत्रु सेना ने उन्हें घेर लिया और अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए वे चित्रशिला नामक रंग-बिरंगी चट्टान में समा गईं। मान्यता है कि उस शिला पर आज भी उनके घाघरे के चिह्न दिखते हैं। हर साल मकर संक्रांति (उत्तरायणी) पर रानीबाग में कत्यूरी वंशज और स्थानीय लोग उनकी स्मृति में विशाल जागर लगाते हैं। उन्हें कुमाऊं में 'न्याय की देवी' और 'कुमाऊं की लक्ष्मीबाई' के रूप में पूजा जाता है।
सुझाव: रानीबाग / चित्रशिला या जागर की फोटो
राजुला-मालूशाही की अमर प्रेम गाथा
लोककथाओं के अनुसार मालूशाही कत्यूरी राजा धामदेव के पुत्र (और जियारानी के पौत्र) थे। यह गाथा तिब्बती (भोटिया) व्यापारी की पुत्री राजुला और कत्यूरी राजकुमार मालूशाही के प्रेम की कहानी है, जो उस दौर के तिब्बत-कुमाऊं व्यापारिक संबंधों और सामाजिक संघर्षों का जीवंत समाजशास्त्रीय चित्रण भी करती है।
पतन का त्रासद अध्याय: राजा वीरमदेव और श्राप की लोककथा
लोकगाथाओं में कत्यूरी वंश के अंतिम सम्प्रभु शासक राजा ब्रह्मदेव को 'वीरमदेव' कहा गया है, जिसे अत्याचारी, विलासी और क्रूर बताया गया है। कथा के अनुसार उसने प्रजा पर भारी कर लगाए और जबरन श्रम करवाया। उसके नैतिक पतन की पराकाष्ठा तब हुई जब उसने एक सती और सुंदर स्त्री के शील को भंग करने का कुत्सित प्रयास किया। कहा जाता है कि उस स्त्री ने प्राण त्यागने से पहले श्राप दिया कि जैसे राजा ने उसका घर उजाड़ा, वैसे ही उसका साम्राज्य मिट जाएगा और उसके वंश में पानी देने वाला भी न बचेगा।
इसी जन-आक्रोश से कुमाउनी लोकगीत 'मामी तिले धारो बोला' का जन्म माना जाता है, जो राजनीतिक अस्थिरता और जन-विद्रोह का सांस्कृतिक प्रतीक बन गया। वीरमदेव की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों और सामंतों में सत्ता के लिए गृहयुद्ध छिड़ गया और साम्राज्य बिखर गया।
साम्राज्य के विखंडन के वास्तविक ऐतिहासिक कारण
लोकगाथाएँ श्राप को कारण बताती हैं, पर किसी साम्राज्य का पतन एक घटना से नहीं होता। इतिहास और भू-राजनीति के नज़रिए से मुख्य कारण ये थे:
- अत्यधिक विस्तार और सामंतों का उदय: 11वीं-12वीं सदी तक उपरिक और विषयपति स्वतंत्र होने लगे और अपने-अपने गढ़ बना लिए। इसी दौर में गढ़वाल लगभग 52 छोटे गढ़ों में बँट गया।
- नेपाली खश राजाओं के आक्रमण: 1191 ई. में अशोक चल्ल ने कत्यूरी राज्य के बड़े हिस्से पर अधिकार किया (प्रमाण: गोपेश्वर का त्रिशूल लेख)। 1223 ई. में दुलू (नेपाल) के क्राचल्ल देव ने फिर हमला किया (प्रमाण: बालेश्वर, चंपावत के ताम्रपत्र)।
- चंद और पंवार वंश का उदय: कुमाऊं में सोमचंद ने चंपावत से चंद वंश की नींव रखी और कत्यूरी शाखाओं को एक-एक कर हराया। गढ़वाल में 15वीं सदी तक राजा अजयपाल ने 52 गढ़ जीतकर परमार (पंवार) राज्य खड़ा किया।
- उप-शाखाओं में विभाजन: राजपरिवार ने राज्य बाँटकर छोटी रियासतें बना लीं: अस्कोट (पाल शाखा, 'रजबार', ब्रिटिश काल तक), डोटी (नेपाल), सुई (काली कुमाऊं, जहाँ ब्रह्मदेव मंडी है), साथ ही द्वाराहाट, लखनपुर, सीरा और बारामंडल की शाखाएँ, जिन्हें बाद में चंद राजाओं (विशेषकर रुद्रचंद के काल में) ने समाप्त किया।
निष्कर्ष: उत्तराखंड के इतिहास में कत्यूरियों की स्थायी छाप
कत्यूरी राजवंश केवल शासकों के उत्थान-पतन की कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक, प्रशासनिक और ढाँचागत नींव का इतिहास है। पहली बार हिमालय के बिखरे कबीलों और भौगोलिक खंडों को एक सूत्र में बाँधकर उन्होंने 'कूर्मांचल' की क्षेत्रीय पहचान बनाई। जागेश्वर के देवदार वनों से कटारमल की पहाड़ियों और बैजनाथ की घाटी तक खड़े पाषाण मंदिर आज भी उनके इंजीनियरों और शिल्पकारों की क्षमता की गवाही देते हैं। और वीरमदेव के श्राप की कथा यह सीख देती है कि सत्ता जब लोक-कल्याण का रास्ता छोड़कर शोषण पर उतरती है, तो उसका पतन जनमानस के लोकगीतों में सदियों तक दर्ज रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
कत्यूरी राजवंश कौन था?
कत्यूरी राजवंश उत्तराखंड (कूर्मांचल) का पहला संगठित और विस्तृत साम्राज्य था, जिसने लगभग 7वीं से 11वीं शताब्दी तक शासन किया।
कत्यूरी राजवंश की राजधानी कहाँ थी?
प्रारंभिक राजधानी जोशीमठ (कार्तिकेयपुर) थी। बाद में राजधानी कुमाऊं की कत्यूर घाटी (बैजनाथ क्षेत्र, सुभिक्षपुर) में चली गई।
कत्यूरियों ने कौन-कौन से प्रसिद्ध मंदिर बनवाए?
जागेश्वर धाम, बैजनाथ मंदिर समूह, कटारमल सूर्य मंदिर और पांडुकेश्वर का योगबद्री मंदिर कत्यूरी काल के प्रमुख मंदिर माने जाते हैं।
कत्यूरी साम्राज्य का पतन कैसे हुआ?
लोककथाओं में राजा वीरमदेव के अत्याचार और श्राप को कारण बताया जाता है। ऐतिहासिक रूप से सामंतों का उदय, नेपाली खश राजाओं के आक्रमण, गृहयुद्ध और चंद-पंवार वंश के उदय ने साम्राज्य को बिखेर दिया।

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