उत्तराखंड की अनोखी परंपरा: क्या है | इगास बग्वाल' और इसे दिवाली के 11 दिन बाद क्यों मनाया जाता है.?

जानिए देवभूमि उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकपर्व 'इगास बग्वाल' (बूढ़ी दिवाली) का गौरवशाली इतिहास, वीर माधो सिंह भंडारी की कहानी और 'भैलो' खेलने की खास परंपरा।

देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपनी अनूठी संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए विश्वभर में जाना जाता है। यहाँ के लोकपर्व सिर्फ जश्न मनाने का तरीका नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे गहरा इतिहास और वीर गाथाएं छिपी हैं। ऐसी ही एक बेहद खास और अनोखी परंपरा है— 'इगास बग्वाल' (Igas Bagwal), जिसे उत्तराखंड में 'बूढ़ी दिवाली' (Budhi Diwali) भी कहा जाता है।
मैदानी इलाकों में दिवाली मनाने के ठीक 11 दिन बाद (कार्तिक मास की एकादशी के दिन) उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं के कई हिस्सों में यह पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पहाड़ के लोग दिवाली के 11 दिन बाद यह त्यौहार क्यों मनाते हैं? आइए, Devbhoomi Live के इस खास लेख में जानते हैं इसका गौरवशाली इतिहास।
इगास बग्वाल का ऐतिहासिक महत्व और वीर माधो सिंह भंडारी
इगास मनाने के पीछे सबसे प्रमुख कहानी गढ़वाल के महान सेनापति वीर माधो सिंह भंडारी से जुड़ी है। 17वीं शताब्दी में जब माधो सिंह भंडारी गढ़वाल की सेना का नेतृत्व कर रहे थे, तब उन्हें तिब्बत (दापाघाट) के युद्ध में भेजा गया था। युद्ध काफी लंबा चला और इसी बीच दिवाली का त्यौहार आ गया।
उस समय संचार के साधन नहीं थे, और पहाड़ों में यह अफवाह फैल गई कि वीर माधो सिंह भंडारी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए हैं। इस दुखद खबर के कारण पूरे क्षेत्र में किसी ने भी दिवाली नहीं मनाई। लेकिन दिवाली के 11 दिन बाद, माधो सिंह भंडारी युद्ध जीतकर अपने सैनिकों के साथ सकुशल लौट आए।
अपने वीर सेनापति की जीत और सुरक्षित वापसी की खुशी में लोगों ने 11वें दिन घरों में दीये जलाए, पकवान बनाए और जश्न मनाया। उसी दिन से एकादशी के दिन 'इगास बग्वाल' मनाने की परंपरा शुरू हो गई।
(Image 2: पारंपरिक उत्तराखंडी व्यंजनों या दीयों की फोटो)
Image Alt Text: इगास बग्वाल पर बनाए जाने वाले पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन
'भैलो' (Bhaillo) खेलने की अनूठी परंपरा
इगास बग्वाल का सबसे बड़ा आकर्षण 'भैलो' खेलना है। चीड़ की लकड़ी (छिल्लों) और सूखी बेलों को एक मजबूत रस्सी में बांधकर 'भैलो' तैयार किया जाता है। रात के समय गाँव के लोग एक खुली जगह (चौक) पर इकट्ठा होते हैं।
इसमें आग लगाकर इसे अपने सिर के ऊपर से घुमाया जाता है। यह आग के साथ किया जाने वाला एक पारंपरिक करतब और नृत्य है। ढोल-दमाऊं की थाप पर लोग भैलो घुमाते हुए पारंपरिक गीत गाते हैं और मंडाण (लोक नृत्य) करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, भैलो घुमाने से बुरी आत्माएं और नकारात्मक ऊर्जा गाँव से दूर चली जाती है।
खान-पान और गौ-पूजा का विधान
पहाड़ के किसी भी त्यौहार की तरह इगास भी पारंपरिक व्यंजनों के बिना अधूरा है। इस दिन घरों में उड़द की दाल के पकोड़े, स्वाले (पहाड़ी पूरी), और झंगोरे की खीर विशेष रूप से बनाई जाती है। सुबह उठकर गौशाला की साफ-सफाई की जाती है और गाय-बैलों की पूजा कर उन्हें भी मीठे पकवान खिलाए जाते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
आज के आधुनिक दौर में, जब लोग रोजगार और पढ़ाई के लिए पहाड़ों से पलायन कर शहरों में बस गए हैं, 'इगास बग्वाल' जैसे त्यौहार उन्हें अपनी जड़ों से वापस जुड़ने का मौका देते हैं। हाल ही के वर्षों में राज्य सरकार और स्थानीय लोगों के प्रयासों से इगास को एक नई पहचान मिली है।
क्या आपने कभी अपने गाँव में इगास मनाई है? अपने अनुभव हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं!


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