उत्तराखंड की भौगोलिक पृष्ठभूमि


स्थिति तथा विस्तार :उत्तर प्रदेश का पहाड़ी भाग ही पर्वतीय राज्य                                'उत्तराखंड' के नाम से गठित हुआ इसे राज्य के पूर्व में नेपाल देश स्थित है,  और दोनों के मध्य काली नदी स्पष्ट सीमा बनाती  है| इसके पश्चिमोत्तर  में हिमाचल प्रदेश है। टोन्स नदी दीनों के मध्य अधिकांश सीमा बनाती है। जबकि उत्तराखण्ड के कुछ भाग टोन्स के पश्चिम मैं भी अवस्थित है उत्तर में तिब्बत स्थित है जिसे उत्तराखंड निवासी परंपरा से  'हूण देश ' के नाम से जानते है। इसके दाक्षिण में उत्तर प्रदेश के जनपद है। इस प्रकार ,पूर्व में तया उत्तर मै नेपान तया तिब्बत.(चीन) इसकी अन्त राष्ट्रीय सीमा बनाते हैं,👇👇



 भूगर्भिक रचना( हिमालय का जन्म)

 भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार हिमालय के उत्तरी भाग में विशांत मोड़ दार सेंट्रल आए हैं इसका निर्माण  टीर्शियरी युग में उत्तरी खण्ड अंगारलैंड एवं दक्षिणी खंड़ गोंडवानालैंड के मध्य स्थित टेथिस सागर में जमा होने वाले मलवे क कारण हुआ।भूगर्भिक हलचलों के कारण 
जमा मलबा धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।इस मलवे पर निरंतर दबाव पड़ने के कारण उसमे कई मोड़ पड़ गए। जो तीन प्रमुख अवस्थाेओ मैं ऊपर उठा| इससे महा हिमालय ,लघु हिमालय व शिवालिक हिमालय के पहाड बने।👇👇
              पर्वतीय क्षेत्र के दक्षिण में जब पहाड़िया समाप्त हो जाती है तो वहां से मैदानी भाग शुरू हो जाता है| सबसे पहले पहाड़ियों की तलहटी में भाबर की  पट्टी आती है। भाबर मैं नदी नालों का अधिकांश जल,कंकड़ - पत्थर रेत बजरी की आधिकतावश रिसकर सतह के नीचे -नीचे बहता है। और फिर 30-40 कि.मी . आगे मैदान मे पुनः प्रकट हो जाता है। यह वह क्षेत्र है जहाँ पहाड़ो का रिसकर नीचे पहुंचा पानी भी सतह के करीब आ जाता है। और एक तरह से पानी की खूब तरी रहती है, इसलिए 'तराई' कहलाता है।👇👇

  
 प्राकृतिक प्रदेश

            भूरचना, ऊंचाई एवं वर्षा की मात्रा में अंतर होने से यहाँ  अलग-अलग प्राकृतिक दशाएं पाई जाती हैं| इस आधार पर हम राजीव को पांच प्राकृतिक भागों में बांट सकते हैं👇👇
  1. ट्रांस हिमालय. 👉
  2. महाहिमालय. 👉
  3. मध्य हिमालय. 👉
  4. शिवालिक तथा दून  👉
  5. तराई -भाबर. 👉
1:  ट्रांस हिमालय✍️
       
                 ट्रांस का अर्थ है। दूसरी ओर।शैलमालाओं के उस पार भी उत्तराखण्ड की प्राकृतिक सीमायें है। हिमालय के पार , उत्तराखंड एवं तिब्बत को पृथक करने वाली जैंक्सर पर्वत श्रेणी के अंतर्गत उत्तराखंड की ओर उन्मुख पनढाल है|
 जिसकी चौड़ाई 20-35 किलोमीटर तथा समुद्र तल से ऊंचाई (2500-3500) मी • है| इस भू-भाग की ऊंची नीची घटिया है|👇


2: महाहिमालय ✍️
      
           इसका अधिकांश भाग वर्ष भर बर्फ से ढका रहता है| इसे हिमाद्रि अथवा( बर्फ का घर) भी कहते हैं इसमें 8848 मी• ऊंचाई वाली हिम पर्वत मालाएं शामिल है जिनमें माउंट एवरेस्ट
 कंचनजंघा, कैलाश आदि भी शामिल है|उत्तराखंड में नंदादेवी
[7817 मी•] सबसे ऊंची चोटी है|(कामेटी,बंदरपूंछ, दूनागिरी, त्रिशूल, नंदाकोट चौखम्बा, पंचाचुली) आदि चोटियां 600 मीटर से अधिक ऊंची है यहां पर पेड़ नहीं पाई जाती हैं| कुछ जगहों पर छोटे-मोटे घास के मैदान पाए जाते हैं|👇
               इस क्षेत्र में मिलम, केदारनाथ,गंगोत्री आदि विशाल हिमनद हैं| इसी क्षेत्र से गंगा एवं यमुना नदियों का उद्गम होता है| जलवायु की दृष्टि से यह क्षेत्र सबसे अधिक ठंडा है| ऊंचाई चोटियां सदैव बर्फ से ढकी रहती हैं|👇
      प्राय: 3000 मीटर से 4500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों के अल्पाइन चरागाहों भुटिया जनजाति के लोग अपने पशुओं को चराने आते हैं| यहां वर्षा अधिकांशत: ग्रीष्म ऋतु में होती है|3000मी • की  ऊंचाई वाले भागों में नुकीली पत्ती वाले फर,सरों,चीड़ आदि के वन मिलते हैं। इससे ऊपर घासें और झाड़ियाँ मिलती है।इसके अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रो में वनस्पति का अभाव है।----------👍👍👍


 3: मध्य हिमालय( हिमांचल)✍️


        यह क्षेत्र समुद्र तल से 3000 मीटर से4800मी • ऊंचाई पर है| इस क्षेत्र में गढ़वाल,टिहरी, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, चंपावत
 बागेश्वर, तथा नैनीताल जनपद की पर्वत श्रंखला शामिल हैं| इस भाग में कई नदी घाटियां हैं तथा नैनीताल जनपद में-- नैनीताल, नौकुचियाताल , सातताल, खुरपाताल, सूखाताल, सड़िकाताल एवं भीमताल  झीले हैं।👇
           शीत ऋतु में यहां पर हो बर्फ पड़ती है| मानसून के दौरान यहां भारी बारिश होती है| गर्मियों में मौसम शीतल व सुहावना होता है|इस क्षेत्र में वनों विस्तार है| यहां बाँज,खरसो
बुराँस, चीड़, फर, देवदार एंव सरों के पेड़ होतो हैं, जो काष्ठ उद्योग व अन्य कार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
       इस क्षेत्र की मिट्टी पथरीली,हल्की व कम उपजाऊ वाली है। नादियों की घाटियाँ खूब उपजाऊ हैं। पर्वतीय ढालों पर सीढीदार खेतों में खेती की जाती हैं। इन क्षेत्रो में ढाल,मिट्टी कीस्म,जल की प्राप्ति आदि अनुकूल दशाओ के आघार पर खरीफ तथा रबी की फसले होती हैं। यहाँ धान, गेहूं मडूवा व मोटी दालें होती है| इस क्षेत्र में सेब खुमानी नाशपाती व नींबू प्रजातियां के फल भी पैदा होते हैं|👇


शिवालिक  तथा  दून✍️ 
              
       इस राज्य के मध्य हिमालय के दक्षिण में है| इसे बाह्य हिमालय के नाम से भी जाना जाता है|शिवालिक तथा लघु हिमालय श्रेणियों के मध्य कुछ घाटियाँ भी पाई जाती हैं। जिन्हे 'दून' कहा जाता है। जिसमें देहरादून पछूवादून, पूर्वीदून, चंडीदून, कोटादून, हर-की-दून पातलीदून, चौखमदून, कोटरीदून आदि प्रमुख हैं।दून घाटी 75कि०मी
लम्बी व 25 कि.मी चौडी हैं।👇
          यहाँ के वन आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है। निचले भागों में शीशम, सेमल, आंवला, बॉस, तथा सागौन के वृक्ष एवं पहाड़ियों पर चीड़ के वृक्ष मिलते हैं क्षेत्र में चूने की खदानें हैं।👇


तराई  -भाबर ✍️

 
        भाबर और तराई का भाग शिवालिक श्रेणीयों एवं गंगा के समतल मैदान के मध्य फैला हुआ है| जिसकी धरातलीय ऊंचाई(
1200 मी • तक  है|👇

* भाबर    : कंकरीली एवं पथरीली मिट्टी से बना यह क्षेत्र पर्वतीय                       तलहटी में 35 से 40 किलो मीटर चौड़ी पट्टी के आधार  मे तराई के उत्तरी भाग में मिलता है| इस क्षेत्र की चौड़ाई पश्चिम भाग में पूर्वी भाग की अपेक्षा अधिक हैं|भाबर क्षेत्र में नदियों एवं स्त्रोतों का जल अधिकतर धरातल के ऊपर न बहकर अदृश्य होकर बहता रह है। जलधाराये भी अधिकांश नीचे ही नीचे बहती हुई जाती है| और बाद में तराई क्षेत्र मैं आकर प्रकट होती है।{उदाहरण} = नैनीताल, हल्द्वानी,कालाढूंगी,तथा गढ़वाल के कोटद्वार का इलाका भाबर में आता है|,👇



 * तराई    : तराई एक समतल, नम एवं दलदली मैदान है यह भाबर के समानांतर पट्टी के रूप में विस्तृत है| जलधारीये तराई क्षेत्र में आकर प्रकट हो जाती है। इस क्षेत्र में दलदल भी पाये जाते है। खेती के लिहाज से यह भाग समृद्ध है।👇


मैदानी भागों से उत्तराखण्ड के पर्वतीय भाग में प्रवेश हेतु स्थान द्वार कहलाते हैं। कुछ द्वार इस प्रकार हैं【कोटद्वार,द्वारकोट(ठाकुरद्वारा)  हरिद्वार, चौकीघाट,चिलकिया(ढिकुली) ,चोरगलिया( हल्दद्वानी), बमौरी(काठगोदाम),ब्रह्मदेव(टनपूर),तिमली तथा (देहरादून)】🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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